Sunday, January 11, 2015

नींद के साये मे मैं जागा रहा


नींद के साये मे मैं जागा रहा
रात से लोरी सुन सुन कर थक गया
चाँदनी की चादर भी कम पड़ी मुझको
ख्वाब पलकों तक आकर रुक गया

ये शायद कोई इंक़लाब की दस्तक है
या आँखें ख्वाबों की मेज़बानी नहीं चाहती
मैं बेचैन हूँ नींद से आँखों की दूरी से
और सुबह है कि रात की जवानी नहीं चाहती

यह ख्वाब नींद पर मेहरबान क्यूँ है?
ऐसी क्या कशिश है बेहोशी मे?
होश मे रहूं और आए तो सोचूँ
तोड़ मरोड़ कर देखूं खामोशी मे

Tuesday, January 6, 2015

स्पर्श


उछाले जब तू कदमों को हर्ष मे

अनुभव करूँ तेरा अनुपम स्पर्श मैं

हालांकि तू है उस पार मैं इस पक्ष मे

अनुभव करूँ तेरा अनुपम स्पर्श मैं


तेरा हर स्पर्श मुझ मे एक मोती को जनम देता है

तेरे होने का आभास मुझ मे खुदा का भरम देता है

वह एक क्षण मैं इस दुनिया का नहीं रह जाता

तेरी माँ का चेहरा भी बिजली सा चमक देता है


शांति मिले मन को संघर्ष मे

अनुभव करूँ तेरा अनुपम स्पर्श मैं

उछाले जब तू कदमों को हर्ष मे

अनुभव करूँ तेरा अनुपम स्पर्श मैं


क्या मैं कहूँ कि मैं खुद को भूल जाता हूँ

या फिर यह कि मैं होके भी नहीं होता हूँ

शब्द भावनाओं का प्रतिबिंब बने तो कहूँ

मैं मुझमे भी होता हूँ तुझमे भी होता हूँ


चोट ज्यूँ सहारा खोजे बर्फ मे

अनुभव करूँ तेरा अनुपम स्पर्श मैं

उछाले जब तू कदमों को हर्ष मे

अनुभव करूँ तेरा अनुपम स्पर्श मैं



Saturday, January 3, 2015

मलाल रह जाएगा अगर

थाम के उंगली मेरी तू चला है

मेरे कंधो की सवारी भी तुझे मिली है

जब जब गिरा तू उठाया है मैंने 

भटका तू जब राह दिखाया है मैंने


है खुशी यह मुझको कि मैं तेरे सफ़र मे काम आया

मलाल रह जाएगा अगर तू मेरी उंगली ना छोड़ पाया


मैं अब हूँ पर मैं रहूँगा कब तक?

तेरे सवालों को हल मैं करूँगा कब तक?

मेरे बारे मे तेरा नज़रिया बदलेगा कब?

तेरी ज़िंदगी मे मेरा दखल रुकेगा कब?


मैं साथ हूँ पर अगर तू मेरा बन के रहा साया 

मलाल रह जाएगा अगर तू मेरी उंगली ना छोड़ पाया


पल पल तू देखे क्यूँ मेरी ही ओर?

चलेगा कब तुझ पे खुद का ही ज़ोर?

यह सिलसिला क्या यूँ ही चलता रहेगा?

मेरे पास आके तू यूँ ही रोता रोहेगा?


मेरी सोहबत मे लग रहा तू खुद को ना खोज पाया

मलाल रह जाएगा अगर तू मेरी उंगली ना छोड़ पाया