Tuesday, August 12, 2014

एक मज़दूर का फ़लसफ़ा


सुबह की नरम धूप जब ज़मीन पे बिछ रही थी
मुझे छाँव के बिछौने की तलब महसूस हो रही थी
एक इमारत के नीचे बगीचे में ज़रा सा करवट लिया
पर धीरे धीरे धूप की चादर शरीर को ओढ़ रही थी

कहने को तो सुबह ही थी
पर मेरा आधा दिन गुजर चुका था
आधी दुनिया अभी रोज़ी की तलाश में निकली थी
और मैं काम कर कर के थक चुका था

ज्यूँ ही चादर मेरे चेहरे को ओढ़ लेती
मैं छाँव के बिछौने से गिर जाता
उठकर चला जाता एक और बिछौने की तलाश में
पर मैं छाँव के पीछे और धूप मेरी तलाश में

उस धूप और छाँव के बीच एक संकीर्ण रेखा थी
एक ऐसी रेखा जो हर लम्हा बदलती अपनी जगह थी
शायद यह कहना चाहती थी.. हाँ, शायद यही कहना चाहती थी
कि कुदरत को खबर नहीं, मुझे धूप की गरज है या नहीं

पर जिसकी भी चाहत रहे,
मुझे उसकी चाह मे
आगे बढ़ते रहना होगा
मुझे आगे बढ़ते रहना होगा

Sunday, August 3, 2014

गब्बर: मैं बड़ा डाकू हूँ या वह है

कितने  आदमी थे?

कितने  आदमी थे? 

कितने  आदमी थे, पर कोई न आया 

इंसानियत तो किसी में ना समाया 

रोती रही वह, पिलाघति रही वह 

कुछ शैतानों ने  उसको जलाया

दहेज़ के खातिर जल गयी वह 

जाने कब से है जल रही वह

तीर हमारे जो दिल में लगी है

सदियों से हमको है खल रही वह

सदियों से इसको जो रोक न पाया

कहता है पर "भागो गब्बर आया"

अरे, मैं बड़ा डाकू हूँ या वह है

जिसने ज़मीर अपनी बेचकर खाया