Tuesday, August 12, 2014

एक मजदूर का फलसफा


सुबह की नरम धूप जब ज़मीन पे बिछ रही थी

मुझे छाँव के बिछौने की तलब महशूस हो रही थी

एक इमारत के नीचे वाली बगीचे में लिया ज़रा सा करवट

पर धीरे धीरे धूप की चादर शरीर को ओढ़ रही थी

 

कहने को तो सुबह ही था

पर मेरा आधा दिन गुजर चुका था

आधी दुनिया अभी जब काम पे जा रही थी

मैं काम कर कर के थक चुका था

 

ज्यूँ ही चादर मेरे चेहरे को ओढ़ लेता

मैं छाँव के बिछौने से गिर जाता

उठकर चला जाता एक और बिछौने की तलाश में

पर मैं छाँव के पीछे और धूप मेरी तलाश में

 

उस धूप और छाँव के बीच एक संकीर्ण रेखा थी

एक ऐसी रेखा जो हर लम्हा बदलती अपनी जगह थी

शायद यह कहना चाहती थी.. हाँ, शायद यही कहना चाहती थी

कि कुदरत को खबर नहीं, मुझे धूप की गरज है या नहीं

 

पर जिसकी भी चाहत रहे, उसकी चाह मे

मुझे आगे बढ़ते रहना होगा

मुझे आगे बढ़ते रहना होगा



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