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Thursday, October 17, 2013

प्याज नवरस


श्रृंगार
स्वाद जब मिट्टी में दफ़न हुआ होगा,
        मीठे ने जब तीखे को समर्पण किया होगा
हर पकवान ने तेरे लिए प्रार्थना किया होगा,
        ऐ प्याज, धरती से तू तब उभरा होगा

हास्य
आवेश में आकर पति बोला पत्नी से,
        छुटकारा मुझे कब मिलेगा तुझ से?
ले लूँ अगर उलटे वह साथ फेरे,
        क्या हो जाएँगे शादी के दिन पूरे?
पत्नी बोली किस बात की  है फ़िक्र तुमको,
        चलो सूझ रहा एक हल मुझ को
दस बोरी प्याज जो लाई थी दहेज में,
        वापस करो तो चली जाती हूँ अभी मैं
पति बोला जितना तू मुझ को रुलाई है,
        प्याज मे भी वह बात नहीं
दस बोरी प्याज तेरे मुँह पे मार देता,
        पर इतनी मेरी औकात नहीं

अद्भुत
फिर से सुर और असूरों मे जंग होता,
        आज अगर समुद्र मंथन होता
अमृत छोड़ प्याज लेकर एक असूर भागता,
        उसी वजह से उसका सिर छेदन होता

शांत
बहुत दिनों से रसोई मे जाकर वह रोई नहीं,
        ऐसा नहीं कि हमारे बीच कोई खिटपिट हुई नहीं
मेरी शादी की कविता में जो शांत रस का प्रभाव है,
        वह इसलिए क्यूंकी रसोई मे आजकल प्याज का अभाव है

रौद्र
अमीर ग़रीब हर कोई मेरे सामने एक सा था,
        स्वाद सब के पकवान को एक समान मैं देता था
चंद लोगों के लोभ ने पर मचा दिया है बदहाल,
        ग़रीब हो गया मुझसे दूर, चोर हो रहे मालामाल

वीर
हूँ प्याज मैं सुनलो,
        किस तेज़ का हूँ वंशज मैं
रुला सकता हूँ खुद कटके,
        कट सकता हूँ हस हसके

करुणा
काटते थे मुझको रो कर भी,
        खुश होते थे सब बाँट मुझे
हाय कैसा समय यह आ गया
        जो तरस रहे सब दाँत मुझे

भयानक
इक ऐसा क्या मंज़र होगा,
        स्थिति और बदतर होगा!
जो अभी निगल चुका हूँ मैं,
        क्या प्याज आखरी वह होगा?

विभत्स
जाने ये किसका दुकान है,
        यह प्याज है या कोई और सामान है
इतनी जमाखोरी जो की है कोई,
        छी! वह कैसा इनसान है!!

Thursday, May 23, 2013

पापा, मैं दिखता हूँ बिलकुल आप की तरह

मैं सोचता हूँ बिलकुल आप की तरह,
मैं बोलता हूँ बिलकुल आप की तरह,
मेरे सोच में आप ही की झांकी है, पापा
मैं दिखता हूँ बिलकुल आप की तरह!

जब कभी कहीं ऐसा मोड़ आता है,
जब चलना मुश्किल सा लगता है,
सारी उर्जा लगाने के बाद भी,
आगे बढ़ना मुश्किल सा लगता है!

आँख मूँद कर बस यह सोचता हूँ
कि आप होते तो क्या करते, पापा
और जो मन में आये वह कर देता,
फिर सफर सुहाना सा लगता है!

मैं गिरता हूँ बिलकुल आप की तरह,
मैं उठता हूँ बिलकुल आप की तरह,
मैं आप ही का अक्स हूँ, पापा
मैं दिखता हूँ बिलकुल आप की तरह!

मेरे साथ में हो, मेरे पास में हो,
आप मेरी हर सांस में हो,
अँधेरे में जब जीवन हो सारा,
एक आप ही मेरी हर आस में हो!

आप की हर बात याद है मुझे,
आप हर पल मेरी याद में हो,
बिछड़ गए हम बरसों पहले पर,
आप कल में थे, आप आज में हो!

मैं रुकता हूँ बिलकुल आप की तरह,
मैं चलता हूँ बिलकुल आप की तरह,
मेरे हर  कदम में आप की निशानी है, पापा
मैं दिखता हूँ बिलकुल आप की तरह!

मैं सोचता हूँ बिलकुल आप की तरह,
मैं बोलता हूँ बिलकुल आप की तरह,
मेरे सोच में आप ही की झांकी है, पापा
मैं दिखता हूँ बिलकुल आप की तरह!
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MAIN SOCHTA HUN BILKUL AAP KI TARAH,
MAIN BOLTA HUN BILKUL AAP KI TARAH,
MERE SOCH ME AAP HI KI JHANKI HAI, PAPA
MAIN DIKHTA HUN BILKUL AAP KI TARAH!

JAB KABHI KAHIN AISA MOD AATA HAI,
JAB CHALNA MUSHKIL SA LAGTA HAI!
SAARI URJA LAGANE KE BAAD BHI,
AAGE BADHNA MUSHKIL SA LAGTA HAI!

AANKH MOOND KAR BAS YEH SOCHTA HUN,
KI AAP HOTE TO KYA KARTE, PAPA
AUR JO MAN ME AAYE WOH KAR DETA,
PHIR SAFAR SUHANA SA LAGTA HAI!

MAIN GIRTA HUN BILKUL AAP KI TARAH,
MAIN UTHTA HUN BILKUL AAP KI TARAH,
MAIN AAP HI KA AKS HUN, PAPA
MAIN DIKHTA HUN BILKUL AAP KI TARAH!

MERE SAATH ME HO, MERE PAAS ME HO,
AAP MERI HAR SAANS ME HO!
ANDHERE MEIN JAB JEEVAN HO SARA,
EK AAP HI MERI HAR AAS ME HO!

AAP KI HAR BAAT YAAD HAI MUJHE,
AAP HAR PAL MERI YAAD ME HO!
BICHHAD GAYE HUM BARSO PAHLE,
PAR AAP KAL MEIN THE, AAP AAJ MEIN HO!

MAIN RUKTA HUN BILKUL AAP KI TARAH,
MAIN CHALTA HUN BILKUL AAP KI TARAH,
MERE HAR KADAM ME AAP KI NISHANI HAI, PAPA
MAIN DIKHTA HUN BILKUL AAP KI TARAH!

MAIN SOCHTA HUN BILKUL AAP KI TARAH,
MAIN BOLTA HUN BILKUL AAP KI TARAH,
MERE HAR SOCH ME AAP HI KI JHANKI HAI, PAPA
MAIN DIKHTA HUN BILKUL AAP KI TARAH!

Saturday, April 20, 2013

इंसान के लिए भी इंसान इंसान नहीं रहा

सदियों की हमारी सभ्यता का हाल अब यही रहा
इंसान के लिए भी इंसान इंसान नहीं रहा 

नेता कहके सर पे जिसे बिठाये थे 
सत्ता के नशे में तन के बेठा है 
जिसे सौंपा था हिफाज़त का जिम्मा 
वही  लूटेरा बन के बेठा है 

हकीम, जिसे माना था खुदा 
कर रहा जिस्म का सौदा है 
शिक्षा का जो मंदिर था पहले 
वह व्यापारियों का अड्डा है  

खुदगर्ज़ी में अब दूसरों का खयाल नहीं रहा 
इंसान के लिए भी इंसान इंसान नहीं रहा 

सब फरयादी है तो कानून कौन तोड़ रहा है
कोई जुर्म कर रहा है तो कोई जुर्म होते देख रहा है  
बेटी को किसी का बेटा छेड़ रहा है 
तो बेटा किसी की बेटी को छेड़ रहा है 

अपने आपको बचाने के फिराक में 
हर कोई दुसरे की तरफ इशारा कर  रहा है 
कोई आग लगा के तमाशा देख रहा है 
तो कोई उसी आग में हाथ सेक रहा है 

खुद के गिरेबां में झाँकने का मजाल नहीं रहा 
इंसान के लिए भी इंसान इंसान नहीं रहा

सदियों की हमारी सभ्यता का हाल अब यही रहा  
इंसान के लिए भी इंसान इंसान नहीं रहा 
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Sadiyon ki hamari sabhyata ka haal ab yahi raha
Insaan ke liye bhi insaan insaan nahin raha

Neta kahke sar pe jise bithaye the
Satta ke nashe me tan ke baitha hai 
Jise saumpa tha hifazat ka jimma
Wohi lootera ban ke baitha hai

Hakeem, jise mana tha khuda
Kar raha jism ka sauda hai
Shiksha ka jo mandir tha pahle
Woh vyapariyon ka adda hai

Khudgarzi me dusron ka ab khayal nahin raha
Insaan ke liye bhi insaan insaan nahin raha

Sab faryadi hai to kanoon kaun tod raha hai
Koi jurm kar raha hai to koi jurm hote dekh raha hai
Beti ko kisi ka beta chhed raha hai
To beta kisi ki beti ko chhed raha hai

Apne aapko bachane ke firaq me
Har koi dusre ki taraf ishara kar raha hai
Koi aag laga ke tamasha dekh raha hai
To koi usi aag me haath sek raha hai

Khud ke gireban me jhankne ka majal nahin raha
Insaan ke liye bhi insaan insaan nahin raha

Sadiyon ki hamari sabhyata ka haal ab yahi raha
Insaan ke liye bhi insaan insaan nahin raha



Wednesday, April 17, 2013

जो मेरे सामने तू आती है

हर बात मेरे लबों पे रुक जाती है
जो मेरे सामने तू आती है

तू पलकें उठाके मुझे देखा न कर
मेरी नज़रें तेरी आँखों में थम जाती है

उन थरकती होठों को कुछ कहने न दे
बेवाक मेरी जुबां लडखडा जाती है

वह लट को अपने रुखसार पे ठहरने न दे
मेरी ज़हन में वही तस्वीर छप जाती है

पर यह सुनके तू मुझसे दूर न जाया कर
फिर मेरी  निगाहें तुझे ही बुलाती  हैं

धडकनों की रफ़्तार बढ़ जाती है
जो मेरे सामने तू आती है

हर बात मेरे लबों पे रुक जाती है
जो मेरे सामने तू आती है

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Har baat mere labon pe ruk jati hai
Jo mere saamne tu aati hai

Tu palken uthake mujhe dekha na kar
Meri nazren teri aankhon mein tham jati hai

Un tharakti hothon ko kuch kahne na de
Bewak meri zuban ladkhada jati hai

Woh lat ko apne rukhsaar pe thaharne na de
Meri zahan mein woh tasveer chhap jati hai

Par yeh sunke tu mujhse door na jaya kar
Meri nigahen phir tujhe hi bulati hai

Dhadkanon ki raftaar badh jati hai
Jo mere saamne tu aati hai

Har baat mere labon pe ruk jati hai
Jo mere saamne tu aati hai


Saturday, April 13, 2013

असमंजस


वह सुबह भी है वह शाम भी; 
वह दिन भी है वह रात भी;
पर कुछ अधूरा सा है आज तो!
मन बावरा सा है आज तो!
मैं ढूंढ रहा हूँ क्या?
मैं ढूंढ रहा हूँ किसे?
कुछ मिलेगा मुझे आज तो!
या कोई ढूंढेगा मुझे आज तो!

मैं वहां हूँ जहाँ होना था?
या मैं वहां था जहाँ होना था?
मैं खुद को भूल गया हूँ आज तो!
मैं खुद को खोज रहा हूँ आज तो!

मन मचल रहा है बहुत?
या मन शिथिल हुआ है बहुत?
ये सूनापन चुभ रहा है आज तो!
धैर्य दीपक बुझ रहा है आज तो!
 
वह सुबह भी है वह शाम भी; 
वह दिन भी है वह रात भी;
पर कुछ अधूरा सा है आज तो!
मन बावरा सा है आज तो!
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Woh subah bhi hai woh sham bhi
Woh din bhi hai woh raat bhi
Par kuch adhoora sa hai aaj to
Man bawra sa hai aaj to

Main dhoondh raha hun kya?
Main dhoondh raha hun kise?
Kuch milega mujhe aaj to
Ya koi dhoondhega mujhe aaj to

Main wahan hun jahan hona tha?
Ya main wahan tha jahan hona tha?
Main khud ko bhool gaya hun aaj to
Main khud ko khoj raha hun aaj to

Man machal raha hai bohut?
Ya man shithil hua hai bohut?
Yeh suna pan chubh raha hai aaj to
Dhairya deepak bujh raha hai aaj to

Woh subah bhi hai woh sham bhi
Woh din bhi hai woh raat bhi
Par kuch adhoora sa hai aaj to
Man bawra sa hai aaj to

Saturday, February 16, 2013

खुशनसीब हूँ, के यह रिश्ता तुम से जुड़ना था



यह माना कि  मुझे किसी ना किसी से मिलना था
खुशनसीब हूँ, के यह रिश्ता तुम से जुड़ना था

मैं भटक रहा था यूँ ही किसी की तलाश में 
कोई जो चल पड़े जीने को ज़िन्दगी मेरे साथ में 
कोई जो समेट ले मेरे ख्वाब को अपने ख्वाब में 

और  फिर  ज़िन्दगी को ऐसी हसीन गली में मुड़ना था
खुशनसीब हूँ, के यह रिश्ता तुम से जुड़ना था

मिलने से पहले मैं तुमसे मिल चुका  था 
जुड़ने से पहले मैं तुम से जुड़ चुका  था 
तुम मेरी और मैं तुम्हारा बन चुका था  

बस यह राज़ ही है जिसे धीरे धीरे खुलना था  
खुशनसीब हूँ, के यह रिश्ता तुम से जुड़ना था

जो तुम्हारा साथ ना होता, तो  क्या होता
दुनिया में जो भी है, वह तो सब होता
पर बेशक मैं, मैं ना होता  

मेरी शक्सियत को अंदाज़ तुम से मिलना था 
खुशनसीब हूँ, के यह रिश्ता तुम से जुड़ना था  

यह माना कि मुझे किसी ना किसी से मिलना था
 खुशनसीब हूँ, के यह रिश्ता तुम से जुड़ना था

Sunday, November 25, 2012

वक़्त बर्बाद करने के लिए नहीं होता

वक़्त  बर्बाद करने के लिए नहीं होता है;
जो आज होता है वह कल तो नहीं होता है!

गिरे जो बादल बन के बूँद धरती पे;
वह बूँद फिर बादल बन तो सकता है;
पर वक़्त बादल तो नहीं होता है;
जो आज होता है वह कल तो नहीं होता है!

गिरे जो कोई पेड भारी बारिश में;
धरती पे वह कई बीज बो तो सकता है;
पर वक़्त पेड तो नहीं होता है;
जो आज होता है वह कल तो नहीं होता है!

दिशा मोड़े तो भी नदी उफान  में आकर;
एक न एक दिन सागर में वह खो तो सकती है;
पर वक़्त नदी तो नहीं होता है;
जो आज होता है वह कल तो नहीं होता है!

जो सुरज आज डूब रहा है कहीं क्षितिज पर;
वह कल फिर सुबह का सृजन कर तो सकता है;
पर वक़्त सुरज तो नहीं होता है;
जो आज होता है वह कल तो नहीं होता है!

वक़्त  बर्बाद करने के लिए नहीं होता है;
जो आज होता है वह कल तो नहीं होता है!
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Waqt barbaad karne ke liye nahin hota hai;
Jo aaj hota hai woh kal to nahin hota hai!

Gire jo badal ban ke boond dharti pe;
Woh boond phir badal ban to sakte hain;
Par waqt badal to nahin hota hai;
Jo aaj hota hai woh kal to nahin hota hai!

Gire jo koi paed bhaari barish mein;
Dharti pe woh kai beej bo to sakta hai;
Par waqt paed to nahin hota hai;
Jo aaj hota hai woh kal to nahin hota hai!

Disha maude jo nadi ufaan me aakar;
Ek na ek din woh sagar me kho to sakti hai;
Par waqt nadi to nahin hota hai;
Jo aaj hota hai woh kal to nahin hota hai!

Jo suraj aaj doob raha hai kahin kshitij par;
Woh kal phir subah ka srujan kar to sakta hai;
Par waqt suraj to nahin hota hai;
Jo aaj hota hai woh kal to nahin hota hai!

Waqt barbaad karne ke liye nahin hota hai;
Jo aaj hota hai woh kal to nahin hota hai!


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Saturday, November 17, 2012

रात, तू इतनी अकेली क्यूँ?

















तू ठंडक दे रूह को, फिर भी  
तू शुकून दे मन को, फिर भी   
तेरे आगोश में सब करें आराम, फिर भी
आधे वक़्त पे है तेरा नाम, फिर भी 
तेरी कोई नहीं सहेली क्यूँ? 
रात, तू इतनी अकेली क्यूँ?  

थोडा सा रोशनी तुझे देकर 
चाँद क्यूँ इतराता है? 
दूर कोई तारा टिम-टिमाकर 
तुझे क्यूँ चिढाता है?
   
है गवाह तू इतने किस्सों का 
नशे का, चोरी का, गुनाह का  
के भूल जाते सब ये के
तू वजह भी है सुबह का

है इतनी ख़ामोशी तुझ में, फिर भी
है इतनी मदहोशी तुझ में, फिर भी 
तेरे साये में प्यार पनपता है, फिर भी 
तेरे आने से जहां महकता है, फिर भी  
तेरी कोई नहीं सहेली क्यूँ? 
रात, तू इतनी अकेली क्यूँ?  
 
तू ठंडक दे रूह को, फिर भी  
तू शुकून दे मन को, फिर भी   
तेरे आगोश में सब करें आराम, फिर भी
आधे वक़्त पे है तेरा नाम, फिर भी 
तेरी कोई नहीं सहेली क्यूँ? 
रात, तू इतनी अकेली क्यूँ?  

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Wednesday, June 20, 2012

चाँद की शिकायत

जान  मेरी, यह चाँद  मुझे   
देख कितना सताता है!
महीने में सिर्फ एक बार,
तेरा चेहरा दिखाता है!

बेसब्र मैं और यह मुझे
और बेचैन कराता है!
महीने में सिर्फ एक बार,
तेरा चेहरा दिखाता है!

रोज मैं इससे मिन्नतें किया करता हूँ;
महोब्बत की दुहाई भी दिया करता हूँ;
समझ सके मेरी हालत को इसलिए,
कुछ अफ़साने सुना दिया करता हूँ!

पर यह मेरे जज्बातों का,
बेझिझक मजाक उडाता है;
महीने में सिर्फ एक बार,
तेरा चेहरा दिखाता है!

जान  मेरी, यह चाँद  मुझे   
देख कितना सताता है!
महीने में सिर्फ एक बार,
तेरा चेहरा दिखाता है!

अब नहीं होता इंतज़ार रे;
बर्दाश्त की हद हुआ  पार  रे
सावन तो आया पर आँखें हैं प्यासी,
दिल में उदासी बरकरार है!

बादलों में खेल लुक्काछुप्पी,
मायूसी और बढाता है!
महीने में सिर्फ एक ही बार तो,
तेरा चेहरा दिखाता है!

जान  मेरी, यह चाँद  मुझे   
देख कितना सताता है!
महीने में सिर्फ एक बार,
तेरा चेहरा  दिखाता  है!

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Saturday, April 21, 2012

साथ देना मेरा यूहीं बस साथ के लिए!


एक  सोच  में  डूबा  था  मैं  कई  दिनों  से 
के  विशाल  नाराज़  क्यूँ  है  मुझ  से? 
उस  सोच  से  निकला  नहीं  था  के  प्रशांत  भी  खफ़ा  हो  गया; 
ज़हन  में  इक  यही  बात  थी  कि  ऐसा क्या  खता  हो गई! 
आज  जाके  मुझे  पता  चला  के  उनके  नाराज़गी  की वजह  क्या  थी; 
विशाल  को  बिसाल  और  प्रशांत  को  प्रोसांत  जो  मैं  कह  रहा  था! 
बुरा  ना मानो  दोस्तों  के  मैं  यह  गलती  जान  बुझके  ना  किया  करता  था; 
कोई  मेरा  नाम  पूछे तो  मैं  भी  'गणेश ' नहीं  'गणेस' कहा  करता  था! 

पहले  मैं  नाराज़  के  वजाय नाराज  हुआ  करता  था; 
पहले  मैं  ऐश  के  जगह  एस  किया  करता  था; 
पहले  मुझे  शर्म  नहीं  आती  थी , पर  मैं  सर्माता  था; 
पहले  मैं  कैश के  जगह  लोगों  को  केस  दिया  करता  था! 

हुए  कितने  दोस्त  बेवफा , हुए  कितने  अपने  पराये; 
छूटा साथ  कितने  साथियों  का , छूटे  कितने  ख़ुशी  के  साये; 
बस  एक तू  है  जिसने  मुझे  दिया  हमेशा सहारा; 
मेरी  मातृभाषा  तुने  मुझे  कभी  ना  सुधारा; 
मैं  जैसा  हूँ  मुझे  वैसे  ही  अपनाया; 
मेरे  सहुलियत  के  हिसाब  से  खुद को  बनाया!

शुक्रगुज़ार हूँ मैं तेरा इस बात के लिए;
साथ देना मेरा यूहीं बस साथ के लिए!  


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Sunday, January 15, 2012

आदमी इतना भी क्यूँ बेक़रार होता है!

किसी  के  जाने  से  पहले  उसके  आने  का  इंतज़ार  होता  है,
आदमी  इतना  भी  क्यूँ  बेक़रार  होता  है!

दिल में एक आरजू हमेशा बाकि रहती है;
यादों में ख्वाबों के भी झांकी रहती है;
इनकार में भी गुंजाईश हाँ की रहती है;

हर उम्मीद से उम्मीद बरक़रार होता है,
आदमी इतना भी क्यूँ बेक़रार होता है!


किसी  के  जाने  से  पहले  उसके  आने  का  इंतज़ार  होता  है,
आदमी  इतना  भी  क्यूँ  बेक़रार  होता  है!

कुछ ख्वाहिशें पूरे न हो सके तो;
कुछ बंधन टूट के न जुड़ सके तो;
कुछ फासले यूँ ही न घट सके तो;

इंसान को इंसान ही नागवार होता है,
आदमी इतना भी क्यूँ बेक़रार होता है!


किसी  के  जाने  से  पहले  उसके  आने  का  इंतज़ार  होता  है,
आदमी  इतना  भी  क्यूँ  बेक़रार  होता  है!

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Sunday, December 4, 2011

तब भी मेरी निगाहें तुझ से नहीं हटती!


प्यार भी हैरान है कि मैं तुझे  इतना प्यार क्यूँ करता हूँ !
तू मेरे पास नहीं तो कैसे तुझ से रु-ब-रु होता हूँ !

     
महोब्बत की कसम कि तेरे मिलने से पहले ये आलम था !
महोब्बत क्या होती है यह मुझे नहीं मालूम था ?!


एक तेरा ही अरमान, एक तेरी ही आरजू, जुस्तजू !
                    बाकि जहां में मुझे कोई भी चीज़ नहीं जचती !
गर जहाँ तक मेरी नज़र जाये वह सब कुछ मेरा होता !
                   तब भी मेरी निगाहें तुझ से नहीं हटती !



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Friday, October 14, 2011

मन ऊब जाता है अक्सर ऐसे किस्सों से


देखा  किये, मिलना  हुआ, समझे  भी  एक  दुसरे  को  हम, 
लगा  मैं  उनकी  और वह  मेरी   ज़रुरत  हो  जैसे! 
दिन  बीते,  महीने  बीते , फिर  आयी  एक  शाम और वह  पल,
जो  फिर से अनजान  बनाने   का  महूरत  हो  जैसे!

मन  ऊब  जाता  है  अक्सर  ऐसे  किस्सों  से, 
बेमतलबी  बातों  से,  मतलबी  रिश्तों  से!

DEKHA KIYE, MILNA HUA, SAMJHE BHI EK DUSRE KO HUM,
LAGA MAIN UNKI AUR WOH MERI ZAROORAT HO JAISE!
DIN BEETE, MAHINE BEETE, PHIR AAYI EK SHAAM AUR WOH PAL,
JO PHIR SE ANJAAN BANANE KA MAHURAT HO JAISE!

MAN OOB JATA HAI AKSHAR AISE KISSON SE,
BEMATLABI BATON SE, MATLABI RISHTON SE!

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Thursday, September 22, 2011

गम में गहराई तो होगी कम

हर  आलम  को  जो  न करना  है  बयां
हर  बेवसी  जो  न  छोड़े  निशान 
मजबूरियों का  न  हो  जो  कोई  दास्ताँ 

गम  में  गहराई  तो  होगी  कम 
अगर  मैं  रख  लूँ  खामोश  जुबाँ 
 
आहें  न  भर  पाए  जो  यह  दुनियां 
तरस  न  खा  पाए  जो  यह  जहाँ 
अफवाहों  को  मिले  न  जो  कोई  मकां

गम  में  गहराई  तो  होगी  कम 
अगर  मैं  रख  लूँ  खामोश  जुबाँ

कहने  को  तो  मैं  कुछ  भी  कह लूँ  
वजह  पर  कोई  न  दे  पाऊँ  शायद 
करने  को  है  तय  मंजिलें  कई 
एक  कदम  भी  न  जा  पाऊँ शायद

अरमान  खिलें  हैं  गुलशन  की  तरह 
करना  पर  है  खुशबु  बे-असर 
पायेगा  तूफ़ान  जो  ज़िक्र  भी  उसका 
आ  जायेगा  करने  तबाह  बे-सबर 

दिल  में  ही  रहे  जो  दिल  की  सदा
न  होगा  कोई  जो  मुझ  से  खफा 
मांगे  न  कोई  जो  मुझ  से  वफ़ा                 

गम  में  गहराई  तो  होगी  कम 
अगर  मैं  रख  लूँ  खामोश  जुबाँ 

आहें  न  भर  पाए  जो  यह  दुनियां 
तरस  न  खा  पाए  जो  यह  जहाँ 
अफवाहों  को  मिले  न  जो  कोई  मकां

गम  में  गहराई  तो  होगी  कम 
अगर  मैं  रख  लूँ  खामोश  जुबाँ

अपना अनुभव ज़रूर बतायें

Tuesday, August 23, 2011

छुपी हो तुम इस तस्वीर में क्यूँ मगर?

न  जाने  क्यूँ  दिल  बुलाये  तुमको  बेसबर
छुपी  हो  तुम  इस  तस्वीर  में  क्यूँ मगर? 


सोचता  हूँ  क्या  कुछ  गुफ्तगू  हो सकती  है 
पर  जाने दो,  इस दीद  से  ही  जान  अटकी  है
                तो  क्या होगा  गर  तुम हो जाओ  रु-ब-रु
                बेहोशी  का  आलम  होगा, जान पड़ती  है
 

कहना  है कुछ पर, तुम बुरा  मान  जाओ अगर 
छुपी हो तुम इस तस्वीर में क्यूँ मगर?
 

न जाने क्यूँ दिल बुलाये तुमको बेसबर
छुपी हो तुम इस तस्वीर में क्यूँ मगर?

अपना अनुभव ज़रूर बतायें

Sunday, August 21, 2011

कैसी भी हालात में अपने दामन को साफ़ रखें!

खुद  के  अधिकारों  की  रक्षा  करने  की जज़्बात  रखें!

            सच्चाई  के लिए  हमेशा  सही  हाथों  में  हाथ  रखें!

भ्रष्टाचार  से  लढते हुए  चलो  आज  यह  कसम  खाए,
              
           कैसी  भी  हालात  में हम  अपने  दामन  को  साफ़  रखें!

KHUD KE ADHIKARON KI RAKSHA KARNE KI JAZBAAT RAKHEN!
SACHCHAI KE LIYE HAMESHA SAHI HATHO MEIN HAATH RAKHEN!
BHRASHTACHAR SE LADHTE HUYE CHALO AAJ YAH KASAM KHAYE,
KAISI BHI HALAAT MAIN HUM APNE DAAMAN KO SAAF RAKHEN!

Monday, August 15, 2011

एक ख्वाहिश जगी हुई है


कहीं  किसी  कोने  में  दिल  के 
एक  आस  सी  दबी  हुई  है 
एक हसरत  पूरी  हुई  तो 
एक ख्वाहिश  जगी  हुई है

ख्वाब  हकीक़त  बनने  को  है पर 
ज़ंजीर ज़रा सी तनी हुई है
एक हसरत पूरी हुई तो
एक ख्वाहिश जगी हुई है

मुश्किल  महज़ हवा  सी है
जहाँ  जाओ  वहाँ  रहती  है
उफान में हो तो हर नदी 
किनारे डुबो के बहती है

चोट  कभी  कभी होती  है अच्छी
दर्द  जीने  का एहसास दिलाता  है
ठेस  लगने  का नफा भी है 
दिल  संभलना  सीख  जाता  है

यह  रात  तो लम्बी  थी  थोड़ी 
पर  सुबह  ने  दस्तक  दी  हुई है
एक हसरत पूरी हुई तो
एक ख्वाहिश जगी हुई है

कहीं किसी कोने में दिल के
एक आस सी दबी हुई है
एक हसरत पूरी हुई तो
एक ख्वाहिश जगी हुई है

Wednesday, August 10, 2011

बस यह चाहता हूँ मैं


 मैं  अच्छा  नहीं  मैं  बुरा  नहीं
 मेरे  जाने  से  पहले  मुझे  तुम  सही  से समझ  लो 
 बस  यह  चाहता  हूँ  मैं

मेरे अच्छाइयों  को  न  तुम बुरा कहना 
मेरे बुराइयों  को न तुम अच्छा कहना

इन्ही  सब  से मेरी  यह पहचान  है 
इन  सब पे  मुझे बड़ा  मान  है

मुझे  थोडा  सा  ज्यादा  इज्ज़त  दो  तुम
मेरी  थोडा और  तारीफ  करो  तुम
कब  यह चाहता हूँ मैं

मैं अच्छा नहीं मैं बुरा नहीं
मेरे जाने से पहले मुझे तुम सही से समझ लो
बस यह चाहता हूँ मैं

अपना अनुभव ज़रूर बतायें

Sunday, June 12, 2011

भ्रस्टाचार, तू कब मुझ में समाया था?

आम के बगीचे में घूम रहा था
देखा, पेड़ से एक आम झूल रहा था
छोटा था मैं पर हाथ पहुँच रहा था
तोड़ने से पहले एक बार सोचा था
आम पर मेरा अधिकार कोई ना था
लोभ था भारी पर मेरे सोच पर,
भागा था मैं आम को तोड़ कर

चोरी से जब किसी और का कुछ खाया था
भ्रस्टाचार, क्या तब तू मुझ में समाया था?

जितना भी आता था सब लिख डाला था
सोचा किसी को ज़रा पूछ लेता हूँ,
पूछ  कर थोड़ा कुछ और लिख देता हूँ
देखा एक लड़का कर रहा था नक़ल
कहा दे मुझे वरना जानेगा मास्टर 
दिया पर्चा मुझे  वह डर कर
ख़ुशी ख़ुशी किया मैंने नक़ल 

इस तरह जब चोरी कर के अंक कमाया था
भ्रस्टाचार, क्या तब तू मुझ में समाया था?

नाचा था मैं कोई पागल की तरह
दोस्त की शादी थी इसकी वजह
दोस्त बहुत खुश था और हम भी
दहेज़ में मिली थी गाड़ी और रकम भी
सोचा था कभी मैं भी शादी करूँगा
दहेज में खूब धन माँग आऊँगा
बिना मेहनत के धनी बन जाऊंगा

दूसरे का धन देख जब मैं ललचाया था
भ्रस्टाचार, क्या तब तू मुझ में समाया था?






पड़ोसी

आग लगी थी, चारों और धुआँ धुआँ था कहाँ जाता, इधर खाई तो उधर कुआँ था लूटाके सब हसा मैं बैठ अंगारों पर राख पर बैठ पड़ोसी जो रो रहा था