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Saturday, November 17, 2012

रात, तू इतनी अकेली क्यूँ?

















तू ठंडक दे रूह को, फिर भी  
तू शुकून दे मन को, फिर भी   
तेरे आगोश में सब करें आराम, फिर भी
आधे वक़्त पे है तेरा नाम, फिर भी 
तेरी कोई नहीं सहेली क्यूँ? 
रात, तू इतनी अकेली क्यूँ?  

थोडा सा रोशनी तुझे देकर 
चाँद क्यूँ इतराता है? 
दूर कोई तारा टिम-टिमाकर 
तुझे क्यूँ चिढाता है?
   
है गवाह तू इतने किस्सों का 
नशे का, चोरी का, गुनाह का  
के भूल जाते सब ये के
तू वजह भी है सुबह का

है इतनी ख़ामोशी तुझ में, फिर भी
है इतनी मदहोशी तुझ में, फिर भी 
तेरे साये में प्यार पनपता है, फिर भी 
तेरे आने से जहां महकता है, फिर भी  
तेरी कोई नहीं सहेली क्यूँ? 
रात, तू इतनी अकेली क्यूँ?  
 
तू ठंडक दे रूह को, फिर भी  
तू शुकून दे मन को, फिर भी   
तेरे आगोश में सब करें आराम, फिर भी
आधे वक़्त पे है तेरा नाम, फिर भी 
तेरी कोई नहीं सहेली क्यूँ? 
रात, तू इतनी अकेली क्यूँ?  

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Sunday, December 4, 2011

तब भी मेरी निगाहें तुझ से नहीं हटती!


प्यार भी हैरान है कि मैं तुझे  इतना प्यार क्यूँ करता हूँ !
तू मेरे पास नहीं तो कैसे तुझ से रु-ब-रु होता हूँ !

     
महोब्बत की कसम कि तेरे मिलने से पहले ये आलम था !
महोब्बत क्या होती है यह मुझे नहीं मालूम था ?!


एक तेरा ही अरमान, एक तेरी ही आरजू, जुस्तजू !
                    बाकि जहां में मुझे कोई भी चीज़ नहीं जचती !
गर जहाँ तक मेरी नज़र जाये वह सब कुछ मेरा होता !
                   तब भी मेरी निगाहें तुझ से नहीं हटती !



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Thursday, November 4, 2010

तो क्या मुझे प्यार है तुमसे ..?

खयालों में मेरी तू समाई हुयी है
बातों में यादों में छाई हुयी है
है तेरी ही खुशबू साँसों में मेरे कहीं कहीं
तो क्या मुझे प्यार है तुम से ..? – नहीं नहीं

वजूद मेरे गीतों की तेरी वजह से
है मौसम खुशियों की तेरी वजह से
है तेरी ही जुस्तजू मन में मेरे कहीं कहीं
तो क्या मुझे प्यार है तुम से ..? – नहीं नहीं

जब भी मेरी मुझसे बात होती है
दिल और दिमाग में फसाद होती है
मेरे आँखों से गिरता हर एक आंशु
तेरे लिए मेरी ज़ज्बात होती है

हर उमंग में है तेरी ही गति
हर आशा में है तेरी स्वीकृति
है तेरे ही सपने आखों में मेरे कहीं कहीं
तो क्या मुझे प्यार है तुमसे ..? – नहीं नहीं

मेरा सोचना तुझे मेरा खोजना तुझे
मेरे ख्यालों से मेरा जोड़ना तुझे
ज़माने को खटकती है मेरी पहेलियाँ
मेरे ख्वाबों में मेरा औधना तुझे

होता हूँ बेकरार रह कर तुझसे दूर
नज़रों से ओझल हो तू नहीं यह मंज़ूर

निगाहें मेरे ढूंढें तुझे यहाँ वहां
तो क्या मुझे प्यार है तुमसे ..? – हाँ हाँ

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पड़ोसी

आग लगी थी, चारों और धुआँ धुआँ था कहाँ जाता, इधर खाई तो उधर कुआँ था लूटाके सब हसा मैं बैठ अंगारों पर राख पर बैठ पड़ोसी जो रो रहा था