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Wednesday, October 13, 2010

राज़ दिल के खुलने को है

राज़ दिल के खुलने को है
कोई अपना सुनने को है
रोक कर नींद को है बेठे
आँखें सपने बुनने को है
राज़ दिल के खुलने को है
कोई अपना सुनने को है
है हया के कुछ तो परदे
गुंजाईश कुछ डर की भी है
कुछ इशारा मिल गया है
घूंघट थोड़ी सरकी तो है

मुद्दतों से जो गिरा था
पर्दा वह आज उठने को है
राज़ दिल के खुलने को है
कोई अपना सुनने को है


लेखक: महाराणा गणेश
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पड़ोसी

आग लगी थी, चारों और धुआँ धुआँ था कहाँ जाता, इधर खाई तो उधर कुआँ था लूटाके सब हसा मैं बैठ अंगारों पर राख पर बैठ पड़ोसी जो रो रहा था