Sunday, June 12, 2011

भ्रस्टाचार, तू कब मुझ में समाया था?


आम  के  बगीचे  में  घूम  रहा  था 
देखा  एक  पेड  से  एक  आम  झूल  रहा  था 
छोटा  कद  था  मेरा  पर  हाथ  तभी  भी  पहुँच  रहे  थे 
तोड़ने  से  पहले  एक  बार  सोचा  
के  इस  बाग़  का  मालिक  मैं  नहीं  कोई  और  है 
पर  लोभ  था  भारी  मेरी  इस  सोच  पे, भागा  था मैं उस आम  को लेकर 

थोड़ी  सी  इज्ज़त  खुद  के  नज़रों  में  गवाया  था 
भ्रस्टाचार, क्या  तू  मुझ  में  तब  समाया  था? 

जितना  आता  था  सब  लिख  दिया  था 
सोचा  किसी  को  पूछ  कर  कुछ  और  लिख  देता  हूँ 
तो  दो  चार  अंक  और  मिल  जायेंगे 
इधर  पूछा  उधर  पूछा 
किसी  न देखा पलट कर
फिर नज़र  पड़ी  एक  बन्दे  पर  
जो  नक़ल  कर  रहा  था  एक  कागज  से 
बोला  लिखने  के  बाद  मुझे  दे  वरना  शिकायत करूँगा मास्टर से 
वह  बेचारा  फटाफट  लिख  के  मुझे  दिया 
मैंने  ख़ुशी  ख़ुशी  पर  डरे  डरे  नक़ल  किया  

इस  तरह  से  जब  चोरी  कर  के  मैंने  कुछ  अंक  लिया  था 
भ्रस्टाचार, क्या  तू  मुझ  में  तब  समाया  था?  

नाचा  था  मैं  कोई  पागल  की  तरह 
सब  कहने  लगे  थे  शादी  मेरी  दोस्त  की  है  मेरी  नहीं 
दोस्त  बहुत  खुश  था  और  मैं  भी 
दहेज़  में  मिला  था  उसको  गाड़ी  भी  और  मोटी रकम  भी 
मैंने  सोचा  था  कभी  मैं  भी  ऐसे  ही  दूल्हा  बनूँगा 
साधनोसे  भरी  गाड़ी  दहेज़  में  मिली  गाड़ी  के  पीछे  मेरे  घर  तक  आ  जाएगी 
बिना  मेहनत  के  मैं  एक  दिन  यूँ  ही  अमीर  हो  जाऊंगा 

अपने  सोच  पे  मैं  तब  भी  नहीं  शरमाया  था 
भ्रस्टाचार, क्या  तू  मुझ  में  तब  समाया  था?