Sunday, February 2, 2014

पानी की धरती



नदी में सरोवर में रहता था पानी

पाकर उसे थी मगन धरती रानी

 

सूरज ने अपना जो चाल चलाया

पानी को अपने वह पास बुलाया

 

जुदा हो गया फिर धरती से पानी

रह गयी तरसती फिर अवनी दिवानी

 

धरती का मुख सूख गया जब

पानी बिन उससे रहा ना गया तब

 

रोई बहुत वह फूट फूट के

खोजी फिर पानी को खुद ही टूट के

 

धरती के आँचल में सागर पड़ा था

पर क्या करे उसमे नमक भरा था

 

सूखी थी धरती, फिर भी खिली थी

मोहब्बत को उसकी तरक्की मिली थी

 

बिछड़ के कहाँ पर खुश होता पानी

जुदाई ने रोका था उसकी रवानी

 

गम ने पानी का रंग छीन डाला

नीला जो था अब वह हो गया काला

 

असंभव हुआ जब यूँ जीवन बिताना

धरा पे पानी ने बरसने को ठाना

 

मुस्किल था सूरज से हाथ छुड़ाना

पर आसमाँ कब था उसका ठिकाना

 

मोहब्बत पे अपनी निगाहें गड़ा के

गरजने लगा पानी दहाड़ लगा के

 

सुन कर वह गर्जन रवि  भी गया छुप

गगन में चला फिर पानी का तांडव

 

उन्माद में जब वह ताली बजाया

सूरज से प्रखर चिंगारी जगाया

 

जीत गयी फिर सच्ची मोहब्बत

मिला जब धरती को पानी का सोहबत

 

मिट्टी से सोंधी खुशबू जो आई

संसार में सारे प्रेम जगाई