Monday, March 21, 2011

पूर्वानुभव (Deja Vu)

वह रोशनी वही बुझी बुझी सी है
वह डालियाँ वही रूखी रूखी सी है
वह रास्ते वही हैं ऊबड़ खाबड़ 
वह नदिया वही सूखी सूखी सी है 

वह पनघट पहचाना सा लगे 
वह राही दीवाना सा लगे 
सहमायी सी वही युवती खडी
ठहरा यह पल ठिकाना सा लगे 

यह कैसी अजीब कश्मकश है 
वहम या शायद कोई अक्स है 
अनदेखा अंजाना हर राह पर 
जाना पहचाना सा हर शख्स है  

हर पुतला लगे आदमी ठहरा सा
हर आदमी चलता फिरता पुतला सा 
यूँ लगा मुझे इस घडी जैसे  
इन्ही रास्तों से कभी मैं गुज़रा था 

अपना अनुभव ज़रूर बतायें

5 comments:

  1. Hey Gannu...gud one save some typos...like the feel of it...Inhi rasto se hum bhi kabhi guzre the...gud job :)

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  2. do char pal ka bhi basera tha
    kabhi is jagaha koi sabera tha
    yun laga mujhe iss ghadi jaise
    inhi raston se kabhi gujra tha

    Very nice Sri...

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  3. I like it!!!Very Nicely presented and written.

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  4. Seems like u r nostalgic about something, is it? Well versed, a soul tagged 'weirdo' can only say dat!!! :)

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  5. Thanks Priya.. only a weirdo can understand another..

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