Monday, August 8, 2016

महिला

है तुमसे हर घर सुंदर          

हर देश, हर जगह भी सुंदर

तुम हो जहाँ वह मंज़र

वह पल, वह हवा भी सुंदर


अंधेरों में तुम हो दिया जैसी

हताशा में तुम आशा जैसी

हो मन तुम्हारा भले कोमल

संकट में अटल शिला जैसी


है तुमसे हर बात सुंदर

ज़हन सुंदर जहाँ भी सुंदर

हाल और हालात कैसी भी हो

तुम यहाँ सुंदर वहाँ भी सुंदर


बहुमुखी प्रतिभा तुम्हारी

असीम तुम्हारी क्षमता

श्रम तुम्हारी योग्यता

धरम तुम्हारी दृढ़ता


है तुमसे हर शब्द सुंदर

शेर सुंदर नज़्म भी सुंदर

महाराणा की तुच्छ कविता तो सुंदर

ग़ालिब की हसीन ग़ज़ल भी सुंदर


Tuesday, December 8, 2015

यह वह मोड़ है

यह वह मोड़ है जहाँ सब कुछ धुँधला धुँधला सा है

या तो आँखें नम हैं या ज़िंदगी उजड़ा उजड़ा सा है


Friday, March 13, 2015

नारी, तेरी यही कहानी

हर बाधा को परास्त करने की  तुम  

        क्षमता प्राप्त कर लेती हो

पीड़ा की शेष बिंदु को छूँकर 

        ममता प्राप्त कर लेती हो


सब से अधिक दुख सहती हो पर

        औरों के दुख पर अश्रु बहाती हो

बलिदानों की नींब पर अपने

        हर घर तुम ही सजाती हो


हर रूप में अनुरूप तुम

हर क्षेत्र में उत्कृष्ट तुम

वो गाँव, शहर, वो देश धनी

नारी, हो जहाँ समृद्ध तुम


और अब जब, हर विषय में आगे बढ़ी हो तुम

एवरेस्ट के बाद अंतरिक्ष में खड़ी हो तुम


एक महान कवि की कविता याद करता हूँ

पर युग के हिसाब से बदलने का किंचित प्रयास करता हूँ


भले रहे जीवन भर आँचल में दूध आँखों में पानी

नारी, तेरी यही कहानी, खुद को कभी अबला ना मानी

Tuesday, January 6, 2015

स्पर्श


उछाले जब तू कदमों को हर्ष मे

अनुभव करूँ तेरा अनुपम स्पर्श मैं

हालांकि तू है उस पार मैं इस पक्ष मे

अनुभव करूँ तेरा अनुपम स्पर्श मैं


तेरा हर स्पर्श मुझ मे एक मोती को जनम देता है

तेरे होने का आभास मुझ मे खुदा का भरम देता है

वह एक क्षण मैं इस दुनिया का नहीं रह जाता

तेरी माँ का चेहरा भी बिजली सा चमक देता है


शांति मिले मन को संघर्ष मे

अनुभव करूँ तेरा अनुपम स्पर्श मैं

उछाले जब तू कदमों को हर्ष मे

अनुभव करूँ तेरा अनुपम स्पर्श मैं


क्या मैं कहूँ कि मैं खुद को भूल जाता हूँ

या फिर यह कि मैं होके भी नहीं होता हूँ

शब्द भावनाओं का प्रतिबिंब बने तो कहूँ

मैं मुझमे भी होता हूँ तुझमे भी होता हूँ


चोट ज्यूँ सहारा खोजे बर्फ मे

अनुभव करूँ तेरा अनुपम स्पर्श मैं

उछाले जब तू कदमों को हर्ष मे

अनुभव करूँ तेरा अनुपम स्पर्श मैं




Saturday, January 3, 2015

मलाल रह जाएगा अगर

थाम के उंगली मेरी तू चला है

मेरे कंधो की सवारी भी तुझे मिली है

जब जब गिरा तू उठाया है मैंने 

भटका तू जब राह दिखाया है मैंने


है खुशी यह मुझको कि मैं तेरे सफ़र मे काम आया

मलाल रह जाएगा अगर तू मेरी उंगली ना छोड़ पाया


मैं अब हूँ पर मैं रहूँगा कब तक?

तेरे सवालों को हल मैं करूँगा कब तक?

मेरे बारे मे तेरा नज़रिया बदलेगा कब?

तेरी ज़िंदगी मे मेरा दखल रुकेगा कब?


मैं साथ हूँ पर अगर तू मेरा बन के रहा साया 

मलाल रह जाएगा अगर तू मेरी उंगली ना छोड़ पाया


पल पल तू देखे क्यूँ मेरी ही ओर?

चलेगा कब तुझ पे खुद का ही ज़ोर?

यह सिलसिला क्या यूँ ही चलता रहेगा?

मेरे पास आके तू यूँ ही रोता रोहेगा?


मेरी सोहबत मे लग रहा तू खुद को ना खोज पाया

मलाल रह जाएगा अगर तू मेरी उंगली ना छोड़ पाया





पड़ोसी

आग लगी थी, चारों और धुआँ धुआँ था कहाँ जाता, इधर खाई तो उधर कुआँ था लूटाके सब हसा मैं बैठ अंगारों पर राख पर बैठ पड़ोसी जो रो रहा था