है तुमसे हर घर सुंदर
Monday, August 8, 2016
Tuesday, March 8, 2016
Tuesday, December 8, 2015
Friday, March 13, 2015
नारी, तेरी यही कहानी
हर बाधा को परास्त करने की तुम
क्षमता प्राप्त कर लेती हो
पीड़ा की शेष बिंदु को छूँकर
ममता प्राप्त कर लेती हो
सब से अधिक दुख सहती हो पर
औरों के दुख पर अश्रु बहाती हो
बलिदानों की नींब पर अपने
हर घर तुम ही सजाती हो
हर रूप में अनुरूप तुम
हर क्षेत्र में उत्कृष्ट तुम
वो गाँव, शहर, वो देश धनी
नारी, हो जहाँ समृद्ध तुम
और अब जब, हर विषय में आगे बढ़ी हो तुम
एवरेस्ट के बाद अंतरिक्ष में खड़ी हो तुम
एक महान कवि की कविता याद करता हूँ
पर युग के हिसाब से बदलने का किंचित प्रयास करता हूँ
भले रहे जीवन भर आँचल में दूध आँखों में पानी
नारी, तेरी यही कहानी, खुद को कभी अबला ना मानी
Tuesday, January 6, 2015
स्पर्श
उछाले जब तू कदमों को हर्ष मे
अनुभव करूँ तेरा अनुपम स्पर्श मैं
हालांकि तू है उस पार मैं इस पक्ष मे
अनुभव करूँ तेरा अनुपम स्पर्श मैं
तेरा हर स्पर्श मुझ मे एक मोती को जनम देता है
तेरे होने का आभास मुझ मे खुदा का भरम देता है
वह एक क्षण मैं इस दुनिया का नहीं रह जाता
तेरी माँ का चेहरा भी बिजली सा चमक देता है
शांति मिले मन को संघर्ष मे
अनुभव करूँ तेरा अनुपम स्पर्श मैं
उछाले जब तू कदमों को हर्ष मे
अनुभव करूँ तेरा अनुपम स्पर्श मैं
क्या मैं कहूँ कि मैं खुद को भूल जाता हूँ
या फिर यह कि मैं होके भी नहीं होता हूँ
शब्द भावनाओं का प्रतिबिंब बने तो कहूँ
मैं मुझमे भी होता हूँ तुझमे भी होता हूँ
चोट ज्यूँ सहारा खोजे बर्फ मे
अनुभव करूँ तेरा अनुपम स्पर्श मैं
उछाले जब तू कदमों को हर्ष मे
Saturday, January 3, 2015
मलाल रह जाएगा अगर
थाम के उंगली मेरी तू चला है
मेरे कंधो की सवारी भी तुझे मिली है
जब जब गिरा तू उठाया है मैंने
भटका तू जब राह दिखाया है मैंने
है खुशी यह मुझको कि मैं तेरे सफ़र मे काम आया
मलाल रह जाएगा अगर तू मेरी उंगली ना छोड़ पाया
मैं अब हूँ पर मैं रहूँगा कब तक?
तेरे सवालों को हल मैं करूँगा कब तक?
मेरे बारे मे तेरा नज़रिया बदलेगा कब?
तेरी ज़िंदगी मे मेरा दखल रुकेगा कब?
मैं साथ हूँ पर अगर तू मेरा बन के रहा साया
मलाल रह जाएगा अगर तू मेरी उंगली ना छोड़ पाया
पल पल तू देखे क्यूँ मेरी ही ओर?
चलेगा कब तुझ पे खुद का ही ज़ोर?
यह सिलसिला क्या यूँ ही चलता रहेगा?
मेरे पास आके तू यूँ ही रोता रोहेगा?
मेरी सोहबत मे लग रहा तू खुद को ना खोज पाया
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पड़ोसी
आग लगी थी, चारों और धुआँ धुआँ था कहाँ जाता, इधर खाई तो उधर कुआँ था लूटाके सब हसा मैं बैठ अंगारों पर राख पर बैठ पड़ोसी जो रो रहा था
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देखा है कई बार सूरज को पीला पड़ते हुए, देखा भी है तेरे चेहरे को गुलाबी रंग ओढ़ते हुए, यह आलम है अब के याद नहीं श्याम होती की नहीं, प...
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आग लगी थी, चारों और धुआँ धुआँ था कहाँ जाता, इधर खाई तो उधर कुआँ था लूटाके सब हसा मैं बैठ अंगारों पर राख पर बैठ पड़ोसी जो रो रहा था
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तेरी आँखों में मेरी एक छवि तो दिखने दे तेरे दिल में मेरी एक याद तो टिकने दे रुक जा ज़रा जाने से पहले मेरी आत्मकथा को बिकने दे तेरे ...

