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Thursday, May 23, 2013

पापा, मैं दिखता हूँ बिलकुल आप की तरह

मैं सोचता हूँ बिलकुल आप की तरह,
मैं बोलता हूँ बिलकुल आप की तरह,
मेरे सोच में आप ही की झांकी है, पापा
मैं दिखता हूँ बिलकुल आप की तरह!

जब कभी कहीं ऐसा मोड़ आता है,
जब चलना मुश्किल सा लगता है,
सारी उर्जा लगाने के बाद भी,
आगे बढ़ना मुश्किल सा लगता है!

आँख मूँद कर बस यह सोचता हूँ
कि आप होते तो क्या करते, पापा
और जो मन में आये वह कर देता,
फिर सफर सुहाना सा लगता है!

मैं गिरता हूँ बिलकुल आप की तरह,
मैं उठता हूँ बिलकुल आप की तरह,
मैं आप ही का अक्स हूँ, पापा
मैं दिखता हूँ बिलकुल आप की तरह!

मेरे साथ में हो, मेरे पास में हो,
आप मेरी हर सांस में हो,
अँधेरे में जब जीवन हो सारा,
एक आप ही मेरी हर आस में हो!

आप की हर बात याद है मुझे,
आप हर पल मेरी याद में हो,
बिछड़ गए हम बरसों पहले पर,
आप कल में थे, आप आज में हो!

मैं रुकता हूँ बिलकुल आप की तरह,
मैं चलता हूँ बिलकुल आप की तरह,
मेरे हर  कदम में आप की निशानी है, पापा
मैं दिखता हूँ बिलकुल आप की तरह!

मैं सोचता हूँ बिलकुल आप की तरह,
मैं बोलता हूँ बिलकुल आप की तरह,
मेरे सोच में आप ही की झांकी है, पापा
मैं दिखता हूँ बिलकुल आप की तरह!
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MAIN SOCHTA HUN BILKUL AAP KI TARAH,
MAIN BOLTA HUN BILKUL AAP KI TARAH,
MERE SOCH ME AAP HI KI JHANKI HAI, PAPA
MAIN DIKHTA HUN BILKUL AAP KI TARAH!

JAB KABHI KAHIN AISA MOD AATA HAI,
JAB CHALNA MUSHKIL SA LAGTA HAI!
SAARI URJA LAGANE KE BAAD BHI,
AAGE BADHNA MUSHKIL SA LAGTA HAI!

AANKH MOOND KAR BAS YEH SOCHTA HUN,
KI AAP HOTE TO KYA KARTE, PAPA
AUR JO MAN ME AAYE WOH KAR DETA,
PHIR SAFAR SUHANA SA LAGTA HAI!

MAIN GIRTA HUN BILKUL AAP KI TARAH,
MAIN UTHTA HUN BILKUL AAP KI TARAH,
MAIN AAP HI KA AKS HUN, PAPA
MAIN DIKHTA HUN BILKUL AAP KI TARAH!

MERE SAATH ME HO, MERE PAAS ME HO,
AAP MERI HAR SAANS ME HO!
ANDHERE MEIN JAB JEEVAN HO SARA,
EK AAP HI MERI HAR AAS ME HO!

AAP KI HAR BAAT YAAD HAI MUJHE,
AAP HAR PAL MERI YAAD ME HO!
BICHHAD GAYE HUM BARSO PAHLE,
PAR AAP KAL MEIN THE, AAP AAJ MEIN HO!

MAIN RUKTA HUN BILKUL AAP KI TARAH,
MAIN CHALTA HUN BILKUL AAP KI TARAH,
MERE HAR KADAM ME AAP KI NISHANI HAI, PAPA
MAIN DIKHTA HUN BILKUL AAP KI TARAH!

MAIN SOCHTA HUN BILKUL AAP KI TARAH,
MAIN BOLTA HUN BILKUL AAP KI TARAH,
MERE HAR SOCH ME AAP HI KI JHANKI HAI, PAPA
MAIN DIKHTA HUN BILKUL AAP KI TARAH!

Wednesday, April 17, 2013

जो मेरे सामने तू आती है

हर बात मेरे लबों पे रुक जाती है
जो मेरे सामने तू आती है

तू पलकें उठाके मुझे देखा न कर
मेरी नज़रें तेरी आँखों में थम जाती है

उन थरकती होठों को कुछ कहने न दे
बेवाक मेरी जुबां लडखडा जाती है

वह लट को अपने रुखसार पे ठहरने न दे
मेरी ज़हन में वही तस्वीर छप जाती है

पर यह सुनके तू मुझसे दूर न जाया कर
फिर मेरी  निगाहें तुझे ही बुलाती  हैं

धडकनों की रफ़्तार बढ़ जाती है
जो मेरे सामने तू आती है

हर बात मेरे लबों पे रुक जाती है
जो मेरे सामने तू आती है

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Har baat mere labon pe ruk jati hai
Jo mere saamne tu aati hai

Tu palken uthake mujhe dekha na kar
Meri nazren teri aankhon mein tham jati hai

Un tharakti hothon ko kuch kahne na de
Bewak meri zuban ladkhada jati hai

Woh lat ko apne rukhsaar pe thaharne na de
Meri zahan mein woh tasveer chhap jati hai

Par yeh sunke tu mujhse door na jaya kar
Meri nigahen phir tujhe hi bulati hai

Dhadkanon ki raftaar badh jati hai
Jo mere saamne tu aati hai

Har baat mere labon pe ruk jati hai
Jo mere saamne tu aati hai


Saturday, February 16, 2013

खुशनसीब हूँ, के यह रिश्ता तुम से जुड़ना था



यह माना कि  मुझे किसी ना किसी से मिलना था
खुशनसीब हूँ, के यह रिश्ता तुम से जुड़ना था

मैं भटक रहा था यूँ ही किसी की तलाश में 
कोई जो चल पड़े जीने को ज़िन्दगी मेरे साथ में 
कोई जो समेट ले मेरे ख्वाब को अपने ख्वाब में 

और  फिर  ज़िन्दगी को ऐसी हसीन गली में मुड़ना था
खुशनसीब हूँ, के यह रिश्ता तुम से जुड़ना था

मिलने से पहले मैं तुमसे मिल चुका  था 
जुड़ने से पहले मैं तुम से जुड़ चुका  था 
तुम मेरी और मैं तुम्हारा बन चुका था  

बस यह राज़ ही है जिसे धीरे धीरे खुलना था  
खुशनसीब हूँ, के यह रिश्ता तुम से जुड़ना था

जो तुम्हारा साथ ना होता, तो  क्या होता
दुनिया में जो भी है, वह तो सब होता
पर बेशक मैं, मैं ना होता  

मेरी शक्सियत को अंदाज़ तुम से मिलना था 
खुशनसीब हूँ, के यह रिश्ता तुम से जुड़ना था  

यह माना कि मुझे किसी ना किसी से मिलना था
 खुशनसीब हूँ, के यह रिश्ता तुम से जुड़ना था

Saturday, April 21, 2012

साथ देना मेरा यूहीं बस साथ के लिए!


एक  सोच  में  डूबा  था  मैं  कई  दिनों  से 
के  विशाल  नाराज़  क्यूँ  है  मुझ  से? 
उस  सोच  से  निकला  नहीं  था  के  प्रशांत  भी  खफ़ा  हो  गया; 
ज़हन  में  इक  यही  बात  थी  कि  ऐसा क्या  खता  हो गई! 
आज  जाके  मुझे  पता  चला  के  उनके  नाराज़गी  की वजह  क्या  थी; 
विशाल  को  बिसाल  और  प्रशांत  को  प्रोसांत  जो  मैं  कह  रहा  था! 
बुरा  ना मानो  दोस्तों  के  मैं  यह  गलती  जान  बुझके  ना  किया  करता  था; 
कोई  मेरा  नाम  पूछे तो  मैं  भी  'गणेश ' नहीं  'गणेस' कहा  करता  था! 

पहले  मैं  नाराज़  के  वजाय नाराज  हुआ  करता  था; 
पहले  मैं  ऐश  के  जगह  एस  किया  करता  था; 
पहले  मुझे  शर्म  नहीं  आती  थी , पर  मैं  सर्माता  था; 
पहले  मैं  कैश के  जगह  लोगों  को  केस  दिया  करता  था! 

हुए  कितने  दोस्त  बेवफा , हुए  कितने  अपने  पराये; 
छूटा साथ  कितने  साथियों  का , छूटे  कितने  ख़ुशी  के  साये; 
बस  एक तू  है  जिसने  मुझे  दिया  हमेशा सहारा; 
मेरी  मातृभाषा  तुने  मुझे  कभी  ना  सुधारा; 
मैं  जैसा  हूँ  मुझे  वैसे  ही  अपनाया; 
मेरे  सहुलियत  के  हिसाब  से  खुद को  बनाया!

शुक्रगुज़ार हूँ मैं तेरा इस बात के लिए;
साथ देना मेरा यूहीं बस साथ के लिए!  


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Sunday, January 15, 2012

आदमी इतना भी क्यूँ बेक़रार होता है!

किसी  के  जाने  से  पहले  उसके  आने  का  इंतज़ार  होता  है,
आदमी  इतना  भी  क्यूँ  बेक़रार  होता  है!

दिल में एक आरजू हमेशा बाकि रहती है;
यादों में ख्वाबों के भी झांकी रहती है;
इनकार में भी गुंजाईश हाँ की रहती है;

हर उम्मीद से उम्मीद बरक़रार होता है,
आदमी इतना भी क्यूँ बेक़रार होता है!


किसी  के  जाने  से  पहले  उसके  आने  का  इंतज़ार  होता  है,
आदमी  इतना  भी  क्यूँ  बेक़रार  होता  है!

कुछ ख्वाहिशें पूरे न हो सके तो;
कुछ बंधन टूट के न जुड़ सके तो;
कुछ फासले यूँ ही न घट सके तो;

इंसान को इंसान ही नागवार होता है,
आदमी इतना भी क्यूँ बेक़रार होता है!


किसी  के  जाने  से  पहले  उसके  आने  का  इंतज़ार  होता  है,
आदमी  इतना  भी  क्यूँ  बेक़रार  होता  है!

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Sunday, December 4, 2011

तब भी मेरी निगाहें तुझ से नहीं हटती!


प्यार भी हैरान है कि मैं तुझे  इतना प्यार क्यूँ करता हूँ !
तू मेरे पास नहीं तो कैसे तुझ से रु-ब-रु होता हूँ !

     
महोब्बत की कसम कि तेरे मिलने से पहले ये आलम था !
महोब्बत क्या होती है यह मुझे नहीं मालूम था ?!


एक तेरा ही अरमान, एक तेरी ही आरजू, जुस्तजू !
                    बाकि जहां में मुझे कोई भी चीज़ नहीं जचती !
गर जहाँ तक मेरी नज़र जाये वह सब कुछ मेरा होता !
                   तब भी मेरी निगाहें तुझ से नहीं हटती !



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Friday, October 14, 2011

मन ऊब जाता है अक्सर ऐसे किस्सों से


देखा  किये, मिलना  हुआ, समझे  भी  एक  दुसरे  को  हम, 
लगा  मैं  उनकी  और वह  मेरी   ज़रुरत  हो  जैसे! 
दिन  बीते,  महीने  बीते , फिर  आयी  एक  शाम और वह  पल,
जो  फिर से अनजान  बनाने   का  महूरत  हो  जैसे!

मन  ऊब  जाता  है  अक्सर  ऐसे  किस्सों  से, 
बेमतलबी  बातों  से,  मतलबी  रिश्तों  से!

DEKHA KIYE, MILNA HUA, SAMJHE BHI EK DUSRE KO HUM,
LAGA MAIN UNKI AUR WOH MERI ZAROORAT HO JAISE!
DIN BEETE, MAHINE BEETE, PHIR AAYI EK SHAAM AUR WOH PAL,
JO PHIR SE ANJAAN BANANE KA MAHURAT HO JAISE!

MAN OOB JATA HAI AKSHAR AISE KISSON SE,
BEMATLABI BATON SE, MATLABI RISHTON SE!

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Thursday, September 22, 2011

गम में गहराई तो होगी कम

हर  आलम  को  जो  न करना  है  बयां
हर  बेवसी  जो  न  छोड़े  निशान 
मजबूरियों का  न  हो  जो  कोई  दास्ताँ 

गम  में  गहराई  तो  होगी  कम 
अगर  मैं  रख  लूँ  खामोश  जुबाँ 
 
आहें  न  भर  पाए  जो  यह  दुनियां 
तरस  न  खा  पाए  जो  यह  जहाँ 
अफवाहों  को  मिले  न  जो  कोई  मकां

गम  में  गहराई  तो  होगी  कम 
अगर  मैं  रख  लूँ  खामोश  जुबाँ

कहने  को  तो  मैं  कुछ  भी  कह लूँ  
वजह  पर  कोई  न  दे  पाऊँ  शायद 
करने  को  है  तय  मंजिलें  कई 
एक  कदम  भी  न  जा  पाऊँ शायद

अरमान  खिलें  हैं  गुलशन  की  तरह 
करना  पर  है  खुशबु  बे-असर 
पायेगा  तूफ़ान  जो  ज़िक्र  भी  उसका 
आ  जायेगा  करने  तबाह  बे-सबर 

दिल  में  ही  रहे  जो  दिल  की  सदा
न  होगा  कोई  जो  मुझ  से  खफा 
मांगे  न  कोई  जो  मुझ  से  वफ़ा                 

गम  में  गहराई  तो  होगी  कम 
अगर  मैं  रख  लूँ  खामोश  जुबाँ 

आहें  न  भर  पाए  जो  यह  दुनियां 
तरस  न  खा  पाए  जो  यह  जहाँ 
अफवाहों  को  मिले  न  जो  कोई  मकां

गम  में  गहराई  तो  होगी  कम 
अगर  मैं  रख  लूँ  खामोश  जुबाँ

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Tuesday, August 23, 2011

छुपी हो तुम इस तस्वीर में क्यूँ मगर?

न  जाने  क्यूँ  दिल  बुलाये  तुमको  बेसबर
छुपी  हो  तुम  इस  तस्वीर  में  क्यूँ मगर? 


सोचता  हूँ  क्या  कुछ  गुफ्तगू  हो सकती  है 
पर  जाने दो,  इस दीद  से  ही  जान  अटकी  है
                तो  क्या होगा  गर  तुम हो जाओ  रु-ब-रु
                बेहोशी  का  आलम  होगा, जान पड़ती  है
 

कहना  है कुछ पर, तुम बुरा  मान  जाओ अगर 
छुपी हो तुम इस तस्वीर में क्यूँ मगर?
 

न जाने क्यूँ दिल बुलाये तुमको बेसबर
छुपी हो तुम इस तस्वीर में क्यूँ मगर?

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Sunday, August 21, 2011

कैसी भी हालात में अपने दामन को साफ़ रखें!

खुद  के  अधिकारों  की  रक्षा  करने  की जज़्बात  रखें!

            सच्चाई  के लिए  हमेशा  सही  हाथों  में  हाथ  रखें!

भ्रष्टाचार  से  लढते हुए  चलो  आज  यह  कसम  खाए,
              
           कैसी  भी  हालात  में हम  अपने  दामन  को  साफ़  रखें!

KHUD KE ADHIKARON KI RAKSHA KARNE KI JAZBAAT RAKHEN!
SACHCHAI KE LIYE HAMESHA SAHI HATHO MEIN HAATH RAKHEN!
BHRASHTACHAR SE LADHTE HUYE CHALO AAJ YAH KASAM KHAYE,
KAISI BHI HALAAT MAIN HUM APNE DAAMAN KO SAAF RAKHEN!

Monday, August 15, 2011

एक ख्वाहिश जगी हुई है


कहीं  किसी  कोने  में  दिल  के 
एक  आस  सी  दबी  हुई  है 
एक हसरत  पूरी  हुई  तो 
एक ख्वाहिश  जगी  हुई है

ख्वाब  हकीक़त  बनने  को  है पर 
ज़ंजीर ज़रा सी तनी हुई है
एक हसरत पूरी हुई तो
एक ख्वाहिश जगी हुई है

मुश्किल  महज़ हवा  सी है
जहाँ  जाओ  वहाँ  रहती  है
उफान में हो तो हर नदी 
किनारे डुबो के बहती है

चोट  कभी  कभी होती  है अच्छी
दर्द  जीने  का एहसास दिलाता  है
ठेस  लगने  का नफा भी है 
दिल  संभलना  सीख  जाता  है

यह  रात  तो लम्बी  थी  थोड़ी 
पर  सुबह  ने  दस्तक  दी  हुई है
एक हसरत पूरी हुई तो
एक ख्वाहिश जगी हुई है

कहीं किसी कोने में दिल के
एक आस सी दबी हुई है
एक हसरत पूरी हुई तो
एक ख्वाहिश जगी हुई है

Wednesday, August 10, 2011

बस यह चाहता हूँ मैं


 मैं  अच्छा  नहीं  मैं  बुरा  नहीं
 मेरे  जाने  से  पहले  मुझे  तुम  सही  से समझ  लो 
 बस  यह  चाहता  हूँ  मैं

मेरे अच्छाइयों  को  न  तुम बुरा कहना 
मेरे बुराइयों  को न तुम अच्छा कहना

इन्ही  सब  से मेरी  यह पहचान  है 
इन  सब पे  मुझे बड़ा  मान  है

मुझे  थोडा  सा  ज्यादा  इज्ज़त  दो  तुम
मेरी  थोडा और  तारीफ  करो  तुम
कब  यह चाहता हूँ मैं

मैं अच्छा नहीं मैं बुरा नहीं
मेरे जाने से पहले मुझे तुम सही से समझ लो
बस यह चाहता हूँ मैं

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Sunday, June 12, 2011

भ्रस्टाचार, तू कब मुझ में समाया था?

आम के बगीचे में घूम रहा था
देखा, पेड़ से एक आम झूल रहा था
छोटा था मैं पर हाथ पहुँच रहा था
तोड़ने से पहले एक बार सोचा था
आम पर मेरा अधिकार कोई ना था
लोभ था भारी पर मेरे सोच पर,
भागा था मैं आम को तोड़ कर

चोरी से जब किसी और का कुछ खाया था
भ्रस्टाचार, क्या तब तू मुझ में समाया था?

जितना भी आता था सब लिख डाला था
सोचा किसी को ज़रा पूछ लेता हूँ,
पूछ  कर थोड़ा कुछ और लिख देता हूँ
देखा एक लड़का कर रहा था नक़ल
कहा दे मुझे वरना जानेगा मास्टर 
दिया पर्चा मुझे  वह डर कर
ख़ुशी ख़ुशी किया मैंने नक़ल 

इस तरह जब चोरी कर के अंक कमाया था
भ्रस्टाचार, क्या तब तू मुझ में समाया था?

नाचा था मैं कोई पागल की तरह
दोस्त की शादी थी इसकी वजह
दोस्त बहुत खुश था और हम भी
दहेज़ में मिली थी गाड़ी और रकम भी
सोचा था कभी मैं भी शादी करूँगा
दहेज में खूब धन माँग आऊँगा
बिना मेहनत के धनी बन जाऊंगा

दूसरे का धन देख जब मैं ललचाया था
भ्रस्टाचार, क्या तब तू मुझ में समाया था?






Saturday, April 2, 2011

कुछ बात अनकही..

मैं  तुझे  दूर  तक  देखना  नहीं  चाहता  था 
वह  तो  इस  डर  से  मेरे पलकें  गिरे  नहीं 
के  आशुं   कहीं  कुछ  ज़ज्बात  बयां  न  कर  दे 

मैं  तेरे  करीब  रहना  नहीं  चाहता  था 
वह  तो  इस  डर  से  दूर  न  जा  सका 
के  फासले  कहीं  बिछड़ना  आशान  न  कर  दे 

मैं  तेरे  बारे  में  सोचना  नहीं  चाहता  था 
वह  तो  इस  डर  से  देखा  तेरा  सपना 
के  तनहाई  कहीं  ज़िन्दगी  वीरान  न  कर  दे 

मैं  तुझ  से  यह  सब  छुपाना  नहीं  चाहता  था 
वह  तो  इस  डर  से  कुछ  बता  न  पाया 
के  मेरा  दर्द  कहीं  तुझे  परेशान  न  कर  दे 


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Tuesday, March 29, 2011

गर यह पता होता

फिर  कभी  न  मिलने  वाले  थे 
                                गर  यह  पता  होता 
उन  दिनों  शायद  मैं 
                                कुछ  देर  कम  सोता 

जब  भी  मैं  तुझे  छत  पर  देखता 
                                मेरी  राह  ताकते  हुए 
जब  भी  तू  हसती  रहती  थी 
                                मेरी  नकल करते  हुए 

जब  भी  तू  नाचती  थी 
        बेखबर  मेरी  मौजूदगी  से 
भनक  ही  से  मेरी  जब  तू 
                                भाग  जाती  थी  रोशनी से 

मेरे  चेहरे  के  रंगत  में 
                               निखार ज़रूर कुछ  ज्यादा  होता 
और  उन  दिनों  शायद  मैं 
                               कुछ  देर  कम  सोता 
                               
फिर  कभी  न  मिलने  वाले  थे 
                               गर  यह  पता  होता 
उन  दिनों  शायद  मैं 
                               कुछ  देर  कम  सोता 
                               




                               

Saturday, February 12, 2011

रात की पाली (Night Shift)

शाम का इंतज़ार नहीं रहता आज कल,

सुबह तुझ से मिलने को दिन मचलता है;

सूरज के उगते ही रात हो जाती है,

चाँद के साथ फिर दिन निकलता है!


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Monday, January 31, 2011

क्यूँ होना मायूस उस ज़िन्दगी से

क्यूँ होना मायूस उस ज़िन्दगी से;
जो खुद मायूस रहना चाहती है;
तुम ज़िन्दगी के सहारे जीना चाहते हो?
ज़िन्दगी तुम्हारे सहारे जीना चाहती है!

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Saturday, January 15, 2011

बेशक याद है

देखा है कई बार सूरज को पीला पड़ते हुए,
देखा भी है तेरे चेहरे को गुलाबी रंग ओढ़ते हुए,
यह आलम है अब के याद नहीं श्याम होती की नहीं,
पर बेशक याद है कैसे तू रो पड़ती थी हसते हुए!

Thursday, November 4, 2010

यहाँ तक आया है तो आगे भी जायेगा

थका हरा उदास जब बैठा अतीत के पुर्जे खोद करदो रास्ते नज़र आये हर गुज़रे हुए मोड़ पर है आज गर ये हालात तोचुने हुए रास्तों के वजह से
कुछ फ़ैसलों से नज़दीकियों के,कुछ से फासलों के वजह से क्या होता अगर यूँ होताक्या होता अगर त्यों होताबेहतर होता या बदतर होताया सबकुछ ज्यों का त्यों होता फ़ैसले से ही अगर होता है सब कुछतो देखा जाए एक को दूसरे से जोड़ करदेखा जब चलते वक़्त को थोड़ा रोक करदो रास्ते नज़र आये हर गुज़रे हुए मोड़ पर हक़ीक़त में लौटातो पर्दा मायूसी से हटादिल से एक आवाज़ सा आयाबोला क्यूँ खोदता है अतीत का साया मत सोच, क्या खोया क्या पायेगायहाँ तक आया है तो आगे भी जायेगायहाँ तक आया है तो आगे भी जायेगा


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पड़ोसी

आग लगी थी, चारों और धुआँ धुआँ था कहाँ जाता, इधर खाई तो उधर कुआँ था लूटाके सब हसा मैं बैठ अंगारों पर राख पर बैठ पड़ोसी जो रो रहा था