Monday, October 22, 2018

यह चेहरा


मुझको मुझसे मिलाती है,
नये कुछ सपने दिखाती है
धुन कोई प्यारा सुनाती है
                        यह चेहरा

अंदाज़-ए-सादगी सिखाती है
मुझमे आशिकी जगाती है
बिन कहे सब कह जाती है
यह चेहरा

कहना चाहता हूँ, पर रोकती है
चुप जो रहूं, तो टोकती है
दिल-ओ-दिमाग़ को झक झोरती है
यह चेहरा

आईना है सच दिखाती है
हसीन अफ़साने सुनाती है
ख्वाब में अक्सर आ जाती है
यह चेहरा

मुद्दत के बाद आती है
मुझे शायर बनाती है
महीनो औुझल हो जाती है
यह चेहरा

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Friday, August 3, 2018

कविता


भावना में जब तुम होती हो आधी अधूरी
उत्सुकता रहती है देखने को तुम्हे पूरी
ना तुम आती हो पूर्ण स्वरूप में ना नींद
कविता, तुम मुझसे मिलने से सकुचाती क्यूँ हो?

सोच की गहराई तक जाके मेरी परीक्षा लेती हो
मेरी अपूर्णता का मुझे आभास कराती हो
ना तुम बनती हो सोच का प्रतिबिंब ना सपने
कविता, तुम इतने धीरे धीरे आती क्यूँ हो?

एक तरफ हँसती प्रेरणा है एक तरफ रूठी हो तुम
ओझल होती प्रेरणा जब तक आती हो तुम
ना तुम रह पाती भावना में ना प्रेरणा
कविता, तुम प्रेरणा से इतनी लज्जाति क्यूँ हो?

तुमसे में समर्पण मांगू तो ना कहती हो
तुम पर मैं समर्पित हो जाऊँ तो ना कहती हो
ना मैं तुम्हारे बिना रह पाऊँ ना तुम्हारे साथ
कविता, तुम इस समाज की भाँति क्यूँ हो?

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मुसाफिर मैं

वह कास्ती सा, जो अंजान अपने साहिल से
मुसाफिर मैं, बे-खबर अपनी मंज़िल से
चलना मेरा काम, रास्ते मेरे साथी
क्या लेना मुझे, दुनिया, तेरी महफ़िल से

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Tuesday, January 30, 2018

मेरी नज़र तो खुद ही में सिमट गया

जाति से निकला तो धरम में उलझ गया, 


धरम से निकला तो जगह में उलझ गया


जाना था आगे पर रास्ता ना दिखा कोई, 


मेरी नज़र तो खुद ही में सिमट गया


Friday, June 30, 2017

बात का बतंगड़ बन सकता है

चुप रह, खामोश रह कि एक झोंका भी बवंडर बन सकता है
सोच समझ कर बात कर, 'गणेश', कि बात का बतंगड़ बन सकता है

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Saturday, June 24, 2017

बचपन कहाँ चला गया

मा की लॉरी से, ममता की डोरी से
दादी की गोदी से, मिट्टी की घोड़ी से
हाथ छुड़ा गया
बचपन, कहाँ चला गया

कहाँ गयी वह पीपल की डाली
गली का बगीचा, ग़ुस्सेल माली
कहाँ गयी वह प्यारी कहानी
राजा की बातें, महलों की रानी

कौन सी ईमली को अब कंकर मारु
किस पनघट को घंटो निहारू
किस पंछी  के अब पीछे भागु
किस सोए कुत्ते को अब लात मारु

यूँ ही घूमने से, मस्ती में झूमने से
बेवजह नाचने से, बेवजह रूठने से
हाथ छुड़ा गया
बचपन, कहाँ चला गया

कड़ी धूप में नदी में नहाना
रिमझिम बारिश का पानी उछालना
बरामदे पे गुज़रे सर्दी के वह दिन
चाँद देखते हुए रास्ते नापना

भागते भागते ज़ोरों से गिर जाना
कोई देखा या नहीं पता लगाना
फिर खुद को खुद ही संभालना
गुस्सा ज़रा सा ज़मीन पर दिखाना

मासूमियत से, घबराहट से
बदमाशियों से, शैतानियों से
हाथ छुड़ा गया
बचपन, कहाँ चला गया

मा की लॉरी से, ममता की डोरी से
दादी की गोदी से, मिट्टी की घोड़ी से
हाथ छुड़ा गया

बचपन, कहाँ चला गया

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Friday, May 19, 2017

वह याद किए तो क्या

बात कुछ हो ना पाई मुलाक़ात किए तो क्या
मुझको बस हिचकी सी आई वह याद किए तो क्या

पड़ोसी

आग लगी थी, चारों और धुआँ धुआँ था कहाँ जाता, इधर खाई तो उधर कुआँ था लूटाके सब हसा मैं बैठ अंगारों पर राख पर बैठ पड़ोसी जो रो रहा था