Sunday, August 9, 2009

रुक जा ज़रा जाने से पहले



तेरी आँखों में मेरी एक छवि तो दिखने दे
तेरे दिल में मेरी एक याद तो टिकने दे

रुक जा ज़रा जाने से पहले
मेरी आत्मकथा को बिकने दे

तेरे संग बिताये हर लम्हा
कलम के सहारे कागज़ पे उतार दूँ
हर नोकझोंक हर वाकया
लफ़्ज़ों के ज़रिये छंदों में सवार दूँ

जुदाई के पहले तुझसे मेरी
दोस्ती के कुछ दास्ताँ तो बने
बंधनों से आज़ादी से पहले
खुमारी के कुछ समां तो बने

गुलशन में कुछ और फूल भी खिलने दे
तेरी ही मदमस्त खुशबु उन्हें भी मिलने दे
ताज़ा कोई घाव देने से पहले
मेरा ज़ख्म पुराना सिलने दे

रुक जा ज़रा जाने पहले
मेरी आत्मकथा को बिकने दे

तेरी आँखों में मेरी एक छवि तो दिखने दे
तेरे दिल में मेरी एक याद तो टिकने दे

रुक जा ज़रा जाने से पहले
मेरी आत्मकथा को बिकने दे

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Sunday, February 22, 2009

यह पत्तें कितने सूखे हैं


यह पत्तें कितने सूखे हैं
शायद मेरी तरह भूखे हैं!

        न जाने कब लहराए थे;
        है आज मगर मुरझाये से;
        कांपते हैं ये सहमाये से;

ऊपर से रूखे रूखे हैं;
शायद मेरी तरह भूखे हैं!

        उनमे से एक गिर ही गया;
        अपनी ज़िन्दगी वह जी गया;
        सजीब्ता जितनी भी थी गया;

औरों के लिए भी मौके हैं;
क्या वे भी मेरी तरह भूखें हैं?!

यह पत्तें कितने सूखे हैं
शायद मेरी तरह भूखे हैं!


लेखक: महाराणा गणेश
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Saturday, February 14, 2009

दो दिल जो भीगे थे कभी

तुझ से कोई शिकवा नहीं
जुदा हूँ पर मैं खफा नहीं
        दो दिल जो भीगे थे कभी
        फुहारों का कसूर था

बेसब्र हालातों में जब
बे -आबरू हम तुम मिले
रुशवाई की आलम में भी
बनते चले जो सिलसिले

मंजिल से थे हम बेखबर
नज़र में थी तो बस डगर
ख्वाबों का था जो कारवां
निगाहों का कसूर था
        दो दिल जो भीगे थे कभी
        फुहारों का कसूर था

मझधार से जो लौट ते
तूफ़ान से यूँ न जूझते
दामन छुड़ा ने अश्क से
पलकों को यूँ न मूंदते

घेरे पे शक के हर दफा
आती नहीं तेरी वफ़ा
थी चाँद की तलाश जो
सितारों का कसूर था
        दो दिल जो भीगे थे कभी
        फुहारों का कसूर था

तुझ से कोई शिकवा नहीं
जुदा हूँ पर मैं खफा नहीं
        दो दिल जो भीगे थे कभी
        फुहारों का कसूर था
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Friday, February 13, 2009

सो जाओ वह बात कहूँ


माथे पे तेरे शिकन की परछाई न आ जाये,

                                                        दिल डरता है!

जुवान से मीठी शहद की बहाव कहीं न थम जाए,

                                                        दिल डरता है!

आँखों के समंदर में तूफ़ान कहीं न उमड़ आये,

                                                        दिल डरता है!

रंग अपना बदल कर चाँद बादलों में कहीं न छिप जाए,

                                                        दिल डरता है!

ऐसे में अधूरा अफसाना

                 तुम से मैं भला कैसे कहूँ

सुन न चाहो जो तुम वह अगर

                 सो जाओ वह बात कहूँ

लेखक: महाराणा गणेश
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Monday, February 2, 2009

लढ चल तू अभी हारा नहीं


तेरे लिए भी सूरज उगे
तेरे लिए भी चंदा खिले
तेरे लिए भी हवा चले
तेरे लिए भी बरखा गिरे

ना अधिक ना ही औरों से कम
अधिकार तेरा है विश्व पर
यूँ ही नहीं होगा वह प्राप्त
हो तत्पर तू संघर्ष तो कर

तब तक तेरा यह युद्ध चला
जब तक तू जग छोड़ा नहीं
निर्णय अभी भी है बाकी

लढ चल तू अभी हारा नहीं !!

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